प्रेम के गहरे रंगों में आपका स्वागत है।
जब स्वयं लेखक मुझे प्रेम की एक अनोखी दास्तान पढ़ने का निमंत्रण दे चुके हों, तो भला मैं कैसे चूक सकती थी!
अंकुश के ब्रश के हर स्ट्रोक में मुझे निनाद और रफ़ीक़ ही दिखाई देते रहे। मानव कौल के जिस उपन्यास 'संयम' की मैं चर्चा करने जा रही हूँ, उसकी पूरी कथा अंकुश नाम के एक चित्रकार के इर्द-गिर्द बुनी गई है। उसका अतीत—एक पल हो या पूरा जीवन—कुछ भी कह लीजिए, वही अतीत उसे भीतर ही भीतर निगलता रहता है।
वर्तमान में उसे आगे बढ़ाने वाली दीपा है, उसे छोड़कर फिर तलाशने वाली तनिषा है, जो एक हाथ से निलय को थामे हुए है। निलय, जो किसी बंधन में बंधना नहीं चाहता; बल्कि बंधन के उस अभिनय का अभ्यस्त हो जाना चाहता है, जिसे हम सब हर दिन जीते हैं।
लेकिन कहानी के सबसे प्रमुख पात्र हैं—निनाद और रफ़ीक़। सबसे सरल पात्र, सबसे कठिन दास्तान के साथ। कठिन इसलिए, क्योंकि वर्षों पहले ऐसी कहानियों का अंत अक्सर चुप्पी में होता था। उन्हें कहने या सुनने वाला कोई नहीं होता था। अच्छा है, किसी ने तो उन्हें शब्द दिए।
चाहे आप लेखक हों या चित्रकार, आपकी कला में भाव होना अनिवार्य है। तभी वह पाठक या दर्शक के मन तक पहुँचती है। इस कहानी की सबसे बड़ी सफलता यही है कि लेखक ने मुझे केवल कहानी पढ़ाई नहीं, बल्कि उसे जीने का अवसर दिया। मैं उस गाँव तक पहुँच गई जहाँ ये पात्र साँस लेते हैं। मैंने उनके साथ सब कुछ महसूस किया। ऐसा लगा मानो रातरानी के पेड़ के नीचे तस्वीरें दफ़न करते समय मैंने भी एक मुट्ठी मिट्टी डाली हो। मुझे लगा, मैंने सब कुछ अपनी आँखों से देखा है। लेखक ने मुझे कहानी दिखाई है—और यही उनकी सबसे बड़ी सफलता है।
कहानी के अन्य पात्र—इनायत और रोशनी—भी बड़ी सहजता और प्रभाव के साथ पाठक के मन में अपनी जगह बना लेते हैं। कई प्रसंग दिल्ली जैसे महानगर की आम-सी लगने वाली कहानियों का अहसास कराते हैं, लेकिन उनके भीतर छिपे भाव उन्हें असाधारण बना देते हैं।
यह उपन्यास आपके भीतर कुछ नए प्रश्न जगाएगा, इसलिए इसे अवश्य पढ़िए। संयम रखिए और संयम के साथ लेखक के सहेजे हुए एक किस्से को कहानी में बदलते हुए उसके नए रूप का आनंद लीजिए।
सौरभ और सुरभि का विशेष धन्यवाद, जिन्होंने मुझे यह पुस्तक दी। सोचा था, पढ़कर लौटा दूँगी—आख़िर लेखक के हस्ताक्षर वाली विशेष प्रति है। लेकिन अब उसे लौटाते हुए ऐसा लगेगा, मानो मैंने एक बार फिर पेंटिंग्स रातरानी के पेड़ के नीचे दफ़ना दी हों।
आप पाठक हैं, और पाठक सर्वोपरि होता है। उसके पास चयन का अधिकार होता है। अपने इस अधिकार का सही उपयोग कीजिए और 'संयम' को अवश्य पढ़िए।
फिर बताइएगा… यदि कहीं आपको भी यह महसूस हो कि आप निनाद बनते जा रहे हैं।
Dipali
.jpg)

No comments:
Post a Comment