Thursday, 9 July 2026

 


प्रेम के गहरे रंगों में आपका स्वागत है।

जब स्वयं लेखक मुझे प्रेम की एक अनोखी दास्तान पढ़ने का निमंत्रण दे चुके हों, तो भला मैं कैसे चूक सकती थी!

अंकुश के ब्रश के हर स्ट्रोक में मुझे निनाद और रफ़ीक़ ही दिखाई देते रहे। मानव कौल के जिस उपन्यास 'संयम' की मैं चर्चा करने जा रही हूँ, उसकी पूरी कथा अंकुश नाम के एक चित्रकार के इर्द-गिर्द बुनी गई है। उसका अतीत—एक पल हो या पूरा जीवन—कुछ भी कह लीजिए, वही अतीत उसे भीतर ही भीतर निगलता रहता है।

वर्तमान में उसे आगे बढ़ाने वाली दीपा है, उसे छोड़कर फिर तलाशने वाली तनिषा है, जो एक हाथ से निलय को थामे हुए है। निलय, जो किसी बंधन में बंधना नहीं चाहता; बल्कि बंधन के उस अभिनय का अभ्यस्त हो जाना चाहता है, जिसे हम सब हर दिन जीते हैं।

लेकिन कहानी के सबसे प्रमुख पात्र हैं—निनाद और रफ़ीक़। सबसे सरल पात्र, सबसे कठिन दास्तान के साथ। कठिन इसलिए, क्योंकि वर्षों पहले ऐसी कहानियों का अंत अक्सर चुप्पी में होता था। उन्हें कहने या सुनने वाला कोई नहीं होता था। अच्छा है, किसी ने तो उन्हें शब्द दिए।

चाहे आप लेखक हों या चित्रकार, आपकी कला में भाव होना अनिवार्य है। तभी वह पाठक या दर्शक के मन तक पहुँचती है। इस कहानी की सबसे बड़ी सफलता यही है कि लेखक ने मुझे केवल कहानी पढ़ाई नहीं, बल्कि उसे जीने का अवसर दिया। मैं उस गाँव तक पहुँच गई जहाँ ये पात्र साँस लेते हैं। मैंने उनके साथ सब कुछ महसूस किया। ऐसा लगा मानो रातरानी के पेड़ के नीचे तस्वीरें दफ़न करते समय मैंने भी एक मुट्ठी मिट्टी डाली हो। मुझे लगा, मैंने सब कुछ अपनी आँखों से देखा है। लेखक ने मुझे कहानी दिखाई है—और यही उनकी सबसे बड़ी सफलता है।

कहानी के अन्य पात्र—इनायत और रोशनी—भी बड़ी सहजता और प्रभाव के साथ पाठक के मन में अपनी जगह बना लेते हैं। कई प्रसंग दिल्ली जैसे महानगर की आम-सी लगने वाली कहानियों का अहसास कराते हैं, लेकिन उनके भीतर छिपे भाव उन्हें असाधारण बना देते हैं।

यह उपन्यास आपके भीतर कुछ नए प्रश्न जगाएगा, इसलिए इसे अवश्य पढ़िए। संयम रखिए और संयम के साथ लेखक के सहेजे हुए एक किस्से को कहानी में बदलते हुए उसके नए रूप का आनंद लीजिए।

सौरभ और सुरभि का विशेष धन्यवाद, जिन्होंने मुझे यह पुस्तक दी। सोचा था, पढ़कर लौटा दूँगी—आख़िर लेखक के हस्ताक्षर वाली विशेष प्रति है। लेकिन अब उसे लौटाते हुए ऐसा लगेगा, मानो मैंने एक बार फिर  पेंटिंग्स रातरानी के पेड़ के नीचे दफ़ना दी हों।

आप पाठक हैं, और पाठक सर्वोपरि होता है। उसके पास चयन का अधिकार होता है। अपने इस अधिकार का सही उपयोग कीजिए और 'संयम' को अवश्य पढ़िए।

फिर बताइएगा… यदि कहीं आपको भी यह महसूस हो कि आप निनाद बनते जा रहे हैं।


Dipali


Sunday, 21 June 2026

 

 


अस्तित्वएक उत्क्रोश

कुछ ही दिनों पहले मेरे हाथ एक पुस्तक लगी। लेखिका का नाम मेरे लिए बिल्कुल नया था, पर हिन्दी कहानियों के प्रति मेरा लगाव इतना गहरा है कि मैंने बिना अधिक सोचे पुस्तक उठा ली और पढ़ना शुरू कर दिया। मन में थोड़ा संशय भी था। सामने लंबा रेल-यात्रा का सफ़र था और साथ में यही एक पुस्तक। सोचा, यदि पुस्तक नीरस हुई तो समय कैसे कटेगा? लेकिन अब खरीद ही ली थी, इसलिए उसे अपना यात्रा-सहचर बना लिया।

पहली ही कहानी "मेरे घर आई एक नन्ही परी" पढ़ते ही मन में यह विश्वास जाग गया कि अब यह पूरी पुस्तक पढ़े बिना नहीं छोड़ी जाएगी। कहानी इतनी सहज, मौलिक और जीवन के भोगे हुए यथार्थ से सराबोर थी कि उसने मुझे अपने साथ बाँध लिया।

इसके बाद तो एक-एक करके सभी कहानियाँ पढ़ती चली गई। 'अस्तित्वएक उत्क्रोश' बीस सशक्त लघुकथाओं से सुसज्जित एक ऐसी कृति है, जो अपने पात्रों और कथानकों के माध्यम से पाठक के मन में गहरी छाप छोड़ती है।

मुझे विशेष रूप से 'अंतरमन' कहानी अत्यंत प्रभावित कर गई। इसकी मुख्य पात्र पारुल अपने अंतर्मन की आवाज़ सुनकर साहसपूर्वक स्वयं को स्थापित करती है। यह कहानी नारी के आत्मबल, आत्मसम्मान और उसके सशक्त व्यक्तित्व का सुंदर प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है।

इसी प्रकार 'आठवाँ वचन' आज के युवा वर्ग को अवश्य पढ़नी चाहिए। यदि विवाह के सात वचनों का वास्तविक अर्थ कहीं छूट गया हो या जीवन की भागदौड़ में उनका महत्व धूमिल पड़ गया हो, तो यह कहानी मानो उस कमी को पूरा करती है। यह जीवनसाथी के प्रति उत्तरदायित्व, सम्मान और भावनात्मक साझेदारी का नया दृष्टिकोण देती है।

'अपराजिता' पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो आज की जाने कितनी उर्मियाँ इस कहानी के माध्यम से अपने जीवन की झलक दिखा रही हों। कहानी में जयपुर फुट का उल्लेख इसे और अधिक यथार्थपरक बना देता है। जिस संस्था ने असंख्य लोगों की निराशा को आशा में बदला है, उसका संदर्भ इस कथा को संवेदनशीलता और विश्वसनीयता दोनों प्रदान करता है।

इस पुस्तक की अनेक कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करती हैं। वे मनुष्य को स्वयं से संवाद करना सिखाती हैं। कुछ कहानियाँ यह भी बताती हैं कि हर सामाजिक दबाव अनुचित नहीं होता। परिवार और समाज के प्रति कुछ उत्तरदायित्व ऐसे होते हैं, जो सामाजिक संतुलन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।

'पेंशन' ऐसी कहानी है जो लंबे समय तक मेरे मन में बनी रहेगी। उसके पात्र, उनकी संवेदनाएँ और परिस्थितियाँ पढ़ने के बाद भी बार-बार स्मृतियों में लौट आती हैं।

पूरी पुस्तक में नारी के विविध रूपोंममता, संघर्ष, आत्मसम्मान, साहस और संवेदनाको अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। लघुकथाएँ पढ़ते समय मुझे बार-बार ऐसा अनुभव हुआ मानो लेखिका स्वयं मेरे सामने बैठकर अपने अनुभव सुना रही हों। कहीं भी कृत्रिमता, बनावटीपन या अनावश्यक नाटकीयता का आभास नहीं हुआ। प्रत्येक कहानी जीवन के बहुत निकट प्रतीत होती है।

पुस्तक पढ़ते हुए एक स्थान पर लेखिका ने सुप्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कविता "नारी तुम केवल श्रद्धा हो" की कुछ पंक्तियाँ लिखकर उन्हें अधूरा छोड़ दिया। शायद उनका उद्देश्य पाठकों को पूरी कविता पढ़ने के लिए प्रेरित करना था। उसी प्रेरणा से यहाँ उसकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो

विश्वास-रजत-नग पगतल में।

पीयूष-स्रोत-सी बहा करो

जीवन के सुंदर समतल में।

देवों की विजय, दानवों की

हारों का होता-युद्ध रहा।

संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवित

रह नित्य-विरूद्ध रहा।

आँसू से भींगे अंचल पर

मन का सब कुछ रखना होगा-

तुमको अपनी स्मित रेखा से

यह संधिपत्र लिखना होगा।

 

अंत में इतना ही कहना चाहूँगी कि 'अस्तित्वएक उत्क्रोश' केवल कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन के अनेक अनुभवों, स्त्री-अस्तित्व, पारिवारिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज़ है। यह पुस्तक पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झाँकने के लिए भी प्रेरित करती है। यदि आप यथार्थपरक, संवेदनशील और विचारोत्तेजक हिन्दी साहित्य पढ़ना पसंद करते हैं, तो यह पुस्तक निश्चित रूप से आपकी पुस्तक-सूची में होनी चाहिए।


Dipali