Sunday, 21 June 2026

 

 


अस्तित्व – एक उत्क्रोश

कुछ ही दिनों पहले मेरे हाथ एक पुस्तक लगी। लेखिका का नाम मेरे लिए बिल्कुल नया था, पर हिन्दी कहानियों के प्रति मेरा लगाव इतना गहरा है कि मैंने बिना अधिक सोचे पुस्तक उठा ली और पढ़ना शुरू कर दिया। मन में थोड़ा संशय भी था। सामने लंबा रेल-यात्रा का सफ़र था और साथ में यही एक पुस्तक। सोचा, यदि पुस्तक नीरस हुई तो समय कैसे कटेगा? लेकिन अब खरीद ही ली थी, इसलिए उसे अपना यात्रा-सहचर बना लिया।

पहली ही कहानी "मेरे घर आई एक नन्ही परी" पढ़ते ही मन में यह विश्वास जाग गया कि अब यह पूरी पुस्तक पढ़े बिना नहीं छोड़ी जाएगी। कहानी इतनी सहज, मौलिक और जीवन के भोगे हुए यथार्थ से सराबोर थी कि उसने मुझे अपने साथ बाँध लिया।

इसके बाद तो एक-एक करके सभी कहानियाँ पढ़ती चली गई। 'अस्तित्व – एक उत्क्रोश' बीस सशक्त लघुकथाओं से सुसज्जित एक ऐसी कृति है, जो अपने पात्रों और कथानकों के माध्यम से पाठक के मन में गहरी छाप छोड़ती है।

मुझे विशेष रूप से 'अंतरमन' कहानी अत्यंत प्रभावित कर गई। इसकी मुख्य पात्र पारुल अपने अंतर्मन की आवाज़ सुनकर साहसपूर्वक स्वयं को स्थापित करती है। यह कहानी नारी के आत्मबल, आत्मसम्मान और उसके सशक्त व्यक्तित्व का सुंदर प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है।

इसी प्रकार 'आठवाँ वचन' आज के युवा वर्ग को अवश्य पढ़नी चाहिए। यदि विवाह के सात वचनों का वास्तविक अर्थ कहीं छूट गया हो या जीवन की भागदौड़ में उनका महत्व धूमिल पड़ गया हो, तो यह कहानी मानो उस कमी को पूरा करती है। यह जीवनसाथी के प्रति उत्तरदायित्व, सम्मान और भावनात्मक साझेदारी का नया दृष्टिकोण देती है।

'अपराजिता' पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो आज की न जाने कितनी उर्मियाँ इस कहानी के माध्यम से अपने जीवन की झलक दिखा रही हों। कहानी में जयपुर फुट का उल्लेख इसे और अधिक यथार्थपरक बना देता है। जिस संस्था ने असंख्य लोगों की निराशा को आशा में बदला है, उसका संदर्भ इस कथा को संवेदनशीलता और विश्वसनीयता दोनों प्रदान करता है।

इस पुस्तक की अनेक कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करती हैं। वे मनुष्य को स्वयं से संवाद करना सिखाती हैं। कुछ कहानियाँ यह भी बताती हैं कि हर सामाजिक दबाव अनुचित नहीं होता। परिवार और समाज के प्रति कुछ उत्तरदायित्व ऐसे होते हैं, जो सामाजिक संतुलन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।

'पेंशन' ऐसी कहानी है जो लंबे समय तक मेरे मन में बनी रहेगी। उसके पात्र, उनकी संवेदनाएँ और परिस्थितियाँ पढ़ने के बाद भी बार-बार स्मृतियों में लौट आती हैं।

पूरी पुस्तक में नारी के विविध रूपों—ममता, संघर्ष, आत्मसम्मान, साहस और संवेदना—को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। लघुकथाएँ पढ़ते समय मुझे बार-बार ऐसा अनुभव हुआ मानो लेखिका स्वयं मेरे सामने बैठकर अपने अनुभव सुना रही हों। कहीं भी कृत्रिमता, बनावटीपन या अनावश्यक नाटकीयता का आभास नहीं हुआ। प्रत्येक कहानी जीवन के बहुत निकट प्रतीत होती है।

पुस्तक पढ़ते हुए एक स्थान पर लेखिका ने सुप्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कविता "नारी तुम केवल श्रद्धा हो" की कुछ पंक्तियाँ लिखकर उन्हें अधूरा छोड़ दिया। शायद उनका उद्देश्य पाठकों को पूरी कविता पढ़ने के लिए प्रेरित करना था। उसी प्रेरणा से यहाँ उसकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं—

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो

विश्वास-रजत-नग पगतल में।

पीयूष-स्रोत-सी बहा करो

जीवन के सुंदर समतल में।

देवों की विजय, दानवों की

हारों का होता-युद्ध रहा।

संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवित

रह नित्य-विरूद्ध रहा।

आँसू से भींगे अंचल पर

मन का सब कुछ रखना होगा-

तुमको अपनी स्मित रेखा से

यह संधिपत्र लिखना होगा।

 

अंत में इतना ही कहना चाहूँगी कि 'अस्तित्व – एक उत्क्रोश' केवल कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन के अनेक अनुभवों, स्त्री-अस्तित्व, पारिवारिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज़ है। यह पुस्तक पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झाँकने के लिए भी प्रेरित करती है। यदि आप यथार्थपरक, संवेदनशील और विचारोत्तेजक हिन्दी साहित्य पढ़ना पसंद करते हैं, तो यह पुस्तक निश्चित रूप से आपकी पुस्तक-सूची में होनी चाहिए।


Dipali

 

 

 

 

 

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