Friday, 19 June 2026

 


क्या तुम…

तुम क्या…

पढ़ते हो?

क्या तुमने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि बीज (गर्भ) धारण करते ही स्त्री की रुचियाँ बदलने लगती हैं। वह क्या पढ़े, क्या देखे और क्या सुनेइन सबका चयन अधिक सजगता और सुनियोजित ढंग से करने लगती है, मानो वह अकेली नहीं, बल्कि अपने भीतर पल रहे नए जीवन के साथ पढ़ रही हो।संसार में आने के कुछ वर्षों बाद ही बालक को पढ़ाना आरम्भ कर दिया जाता है। उसे क्या देखना है, क्या पढ़ना है और क्या सीखना हैसब कुछ सुनियोजित होता है। वह भी मानो अकेला नहीं पढ़ रहा होता, बल्कि उसके साथ परिवार, समाज और आने वाले भविष्य की अपेक्षाएँ भी शिक्षा ग्रहण कर रही होती हैं।विद्यालय में शिक्षक विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। विषयों के नियमित कालांशों के साथ-साथ पुस्तकालय के लिए भी समय निर्धारित होता है। प्रत्येक विद्यार्थी सप्ताह में कम-से-कम एक बार पुस्तकालय अवश्य जाए और अपनी रुचि के अनुसार कोई पुस्तक पढ़े। यदि पुस्तक भी पढ़े, तो रंग-बिरंगी पत्रिकाओं या समाचार-पत्रों के पन्नों पर ही दृष्टि डाले।

पुस्तकालय में कार्य करने वाले लोग भी इस बात पर ध्यान दें कि विद्यार्थी क्या पढ़ रहे हैं। वे उनकी रुचियों को समझें और उन्हें उचित पठन-सामग्री की ओर मार्गदर्शित करें। मानो वे भी अकेले नहीं पढ़ रहे हों, बल्कि उनके साथ उनका व्यक्तित्व, उनके संस्कार और उनका भविष्य भी आकार ले रहा हो।यह पूरी प्रक्रिया विद्यालय स्तर पर कक्षा 12वीं तक नियमित रूप से चलती रहती है। सीबीएसई जैसे शिक्षा बोर्डों में इसे पुस्तकालय कालांश के रूप में भी व्यवस्थित किया गया है। विद्यालयी शिक्षा पूर्ण होने तक यह अपेक्षा की जाती है कि विद्यार्थी पढ़ने की इस दिनचर्या को अपने जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बना चुका होगा।

उसमें इतनी परिपक्वता विकसित हो चुकी होगी कि वह जो पढ़ता है, देखता है और सुनता है, उसका सार ग्रहण कर सके, उसके अर्थ और प्रभाव को समझ सके। क्योंकि इसके बाद वह उच्च शिक्षा की जिस यात्रा पर अग्रसर होता है, वहाँ उसके आत्मबल, आत्मानुशासन और विवेक की ही वास्तविक परीक्षा होती है।

मेरे ऊपर लिखे गए इस लेख में आपने एक बात बार-बार देखी होगीमैंने यह कहा है कि "पाठक मानो अकेला नहीं पढ़ रहा है।" क्या आप जानते हैं, ऐसा क्यों?

क्योंकि वास्तव में हम कभी अकेले नहीं पढ़ते। जब भी हम कुछ पढ़ते हैं, उस पढ़े हुए को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक पूरे समूह तक पहुँचाते हैं। पढ़ना केवल एक व्यक्तिगत क्रिया नहीं है; यह एक सामाजिक प्रक्रिया भी है।

यदि कक्षा में कोई विद्यार्थी रवीन्द्रनाथ ठाकुर को पढ़ रहा है, तो उसे देखकर, उसकी चर्चा सुनकर, पुस्तक के आकर्षक आवरण को देखकर या उसके प्रति उसकी रुचि को देखकर अन्य विद्यार्थी भी उसे पढ़ने के लिए उत्सुक हो सकते हैं। फिर वे विद्यार्थी किसी और को प्रेरित करेंगे। इस प्रकार एक क्रम चलता रहता है और पुस्तक को नए-नए पाठक मिलते रहते हैं।

इसलिए जब भी आप कुछ पढ़ रहे हों, यह याद रखिए कि आप अकेले नहीं पढ़ रहे हैं। आपके पढ़ने का प्रभाव आपके आसपास के लोगों तक अवश्य पहुँचता है।

एक पुस्तकालयाध्यक्ष होने के नाते मैंने यह बात अनेक बार अनुभव की है। मैंने देखा है कि बच्चे प्रेरणा अपने सहपाठियों और मित्रों से अधिक ग्रहण करते हैं। कई बार मित्र द्वारा सुझाई गई पुस्तक उनके लिए शिक्षक द्वारा सुझाई गई पुस्तक से भी अधिक आकर्षक और प्रभावशाली बन जाती है।

यही कारण है कि कुछ पुस्तकें हर कक्षा में पुस्तकालय की अलमारियों से निकलकर विद्यार्थियों के बीच जीवित रहती हैं। वे केवल पुस्तकालय की संपत्ति नहीं रह जातीं, बल्कि विद्यार्थियों की बातचीत, जिज्ञासाओं और अनुभवों का हिस्सा बन जाती हैं। एक पाठक से दूसरे पाठक तक पहुँचते हुए वे निरंतर अपना प्रभाव फैलाती रहती हैं।

इस दृष्टि से पढ़ना केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक संवाद में सहभागी होना भी है। जब एक व्यक्ति पढ़ता है, तो उसके साथ अनेक संभावित पाठक भी उस यात्रा पर निकल पड़ते हैं।

बचपन से हम सब यही सीखते आए हैंखाली बैठे हो तो कुछ पढ़ो। अपनी पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त भी कुछ पढ़ो। पढ़ो, क्योंकि पढ़ना मस्तिष्क की खुराक है। पर मैं इसके साथ एक बात और जोड़ना चाहती हूँकेवल पढ़ो ही नहीं, यह भी देखो कि क्या पढ़ रहे हो।

पढ़ो वही जो तुम्हारे विचारों को समृद्ध करे, तुम्हारी समझ को व्यापक बनाए और तुम्हें समाज में सार्थक तथा प्रभावशाली बनने की दिशा दे। और यदि कभी पढ़ने का समय मिले, तो सुनो। आज असंख्य -पुस्तकें और अनेक मंच उपलब्ध हैं जहाँ पुस्तकों को सुना जा सकता है।

ज्ञान के उस अथाह सागर में गोता लगाने के लिए कभी-कभी अपने ईयरप्लग लगाकर संसार के बाकी शोर को बाहर छोड़ दो और उस श्रव्य संसार का सार ग्रहण करो। वह सार, जो जाने कितने लोगों के अनुभवों, चिंतन, अध्ययन और कल्पना से गुजरकर एक पुस्तक के रूप में हमारे सामने आया है।

सुनो या पढ़ोजो भी करो, पर यह याद रखो कि चयन सावधानी से करना है। एक ओर भारत का विशाल साहित्यिक खजाना है, तो दूसरी ओर रोमांच, रहस्य और थ्रिलर की दुनिया। कहीं यात्राओं के वृत्तांत तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो कहीं महान व्यक्तित्वों की जीवनियाँ तुम्हें नई दिशा देने के लिए तैयार हैं।

तुम पाठक हो, और पाठक सर्वोपरि होता है। चयन का अधिकार भी तुम्हारा है और उत्तरदायित्व भी। अपनी इन्द्रियों पर संयम रखते हुए, अपनी विवेकशीलता को मार्गदर्शक बनाते हुए और अपने पाठक होने के गौरव को बनाए रखते हुए तुम्हें स्वयं ही तय करना है कि तुम्हारे मन और मस्तिष्क में प्रवेश पाने योग्य क्या है।

 

DIPALI 

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